Santosh Kumar Gupta vs State Of Chhattisgarh on 6 May, 2026

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    Chattisgarh High Court

    Santosh Kumar Gupta vs State Of Chhattisgarh on 6 May, 2026

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                                                        {Acq. A. No.-169 of 2015}
    
    
    
    
                                                                                       2026:CGHC:21083
    
                                                                                                         अप्रतिवेद्य
    
    
                                                     छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
    
                                                निर्णय सुरक्षित दिनांक-04/05/2026
    
                                                निर्णय उद्घोषित दिनांक-06/05/2026
    
                                                     दोषमुक्ति अपील क्रमांक-169/2015
    
    
    
                              संतोष कु मार गुप्ता पिता-स्वर्गीय गजाधर प्रसाद गुप्ता, उम्र-लगभग 42 वर्ष, सीनियर
    
                               यार्ड मास्टर, बी.एस.पी. भिलाई, निवासी-मकानं संख्या-34 जी.एस., गली नंबर-14,
    
                               सेक्टर-4, पुलिस थाना-भिलाई-6, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़
    
                                                                                                  -----अपीलार्थी
    
                                                                  विरूद्घ
    
                          1.

    छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा थाना प्रभारी, पुलिस थाना-सरकण्डा, बिलासपुर, जिला-

    बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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    2. श्रीमती रत्ना गुप्ता पति-स्वर्गीय योगेश गुप्ता, उम्र-लगभग 25 वर्ष (वर्तमान में 26),

    निवासी-कृ ष्णा चौक, पुराना सरकण्डा, पुलिस थाना-सरकण्डा, बिलासपुर, जिला-

    बिलासपुर, छत्तीसगढ़

    —–उत्तरवादीगण

    अपीलार्थी द्वारा : श्री अविनाश के . मिश्रा, अधिवक्ता ।

    राज्य/उत्तरवादी क्रमांक-1 द्वारा : श्री राज कु मार साहू, पैनल अधिवक्ता ।

    अभियुक्त/उत्तरवादी क्रमांक-2 द्वारा : सुश्री अदिति सिंघवी, अधिवक्ता ।

    
    
    
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             2026.05.06
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                                   {Acq. A. No.-169 of 2015}
    
    
    
                               न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल
    
                                       !! सी.ए.वी. निर्णय !!
    
    

    1. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-372 के तहत दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत इस

    अपील में विचारण न्यायालय-सत्र न्यायाधीश, बिलासपुर, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़

    द्वारा सत्र प्रकरण क्रमांक-34/2014 “छत्तीसगढ़ राज्य विरूद्घ श्रीमती रत्ना गुप्ता” में

    पारित निर्णय दिनांक-04/07/2015 की वैधता को चुनौती दी गई है । जिसके तहत

    विचारण न्यायालय द्वारा अभियोजन का मामला प्रमाणित न पाते हुए अभियुक्त श्रीमती रत्ना

    गुप्ता को संदेह का लाभ देते हुए धारा-306 भारतीय दण्ड संहिता, 1860 के अपराध से

    दोषमुक्त किया गया है । जिसे आगे “प्रश्नाधीन निर्णय” से संबोधित किया जा रहा है ।

    2. यह अविवादित तथ्य है कि मृतक योगेश गुप्ता का विवाह अभियुक्ता श्रीमती रत्ना गुप्ता के

    साथ वर्ष 2005 में हुआ था । उनकी एक पुत्री, चंचल गुप्ता है । मृतक योगेश गुप्ता दूध का

    व्यवसाय करता था । घटना दिनांक 20/11/2013 की है । घटना के समय दोनों कृ ष्णा

    चौक, पुराना सरकण्डा, जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़ स्थित अपने मकान में निवासरत थे ।

    मृतक योगेश गुप्ता के परिवारजनों में उसका बड़ा भाई अपीलार्थी संतोष गुप्ता (अ.सा.-3),

    माता गंगोत्री गुप्ता (अ.सा.-4) तथा तीन बहनोई, क्रमशः राज किशोर गुप्ता (अ.सा.-7),

    नागेन्द्र कु मार गुप्ता (अ.सा.-9) एवं राजेश गुप्ता (अ.सा.-10) हैं ।

    3. अभियोजन का मामला, संक्षेप में, इस प्रकार है कि अभियुक्ता श्रीमती रत्ना गुप्ता के तीन

    पुरुषों, अर्थात् नान्ही दूध वाले, चिकित्सक सिकरवार तथा पड़ोसी ललित अग्रवाल, से

    अवैध संबंध थे । उक्त संबंधों की जानकारी जब उसके पति योगेश गुप्ता (मृतक) को हुई,

    तब इस संबंध में दोनों के मध्य विवाद होने लगा । मृतक द्वारा मना किए जाने के बावजूद
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    अभियुक्ता अन्य पुरुषों से संबंध बनाए रखती थी तथा अपने पति योगेश गुप्ता को यह कहकर

    धमकी देती थी कि वह अपनी सम्पत्ति उसके नाम कर दे, अन्यथा वह उसे एवं उसके

    परिवारजनों को दहेज के प्रकरण में फँ साकर जेल भिजवा देगी । उक्त प्रताड़ना से क्षुब्ध

    होकर योगेश गुप्ता ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली । घटना की सूचना

    पार्षद श्याम साहू (अ.सा.-6) द्वारा थाना सरकण्डा में दिए जाने पर मर्ग प्रदर्श पी-2

    कायम किया गया । तत्पश्चात् अगले दिन, अर्थात् दिनांक 21/11/2013 को, नक्शा

    पंचायतनामा तैयार कर शव का परीक्षण कराया गया । घटनास्थल का नक्शा प्रदर्श पी-8

    तैयार किया गया । घटनास्थल से मृतक योगेश गुप्ता उर्फ पिंटू द्वारा लिखित सुसाइड नोट

    (प्रश्नाधीन दस्तावेज क्रमांक-1), वसीयत (प्रश्नाधीन दस्तावेज क्रमांक-2), ललित

    अग्रवाल का मोबाइल नंबर अंकित दस्तावेज प्रदर्श पी-39, एक 50/- रुपये का नोट,

    20/- रुपये के दो नोट तथा सैमसंग कं पनी का एक मोबाइल जप्त कर जप्ती पत्रक प्रदर्श

    पी-9 तैयार किया गया । दिनांक 01/12/2013 को मृतक के बड़े भाई एवं अपीलार्थी

    संतोष गुप्ता से मृतक द्वारा दूध के हिसाब-किताब संबंधी पंजी जप्त कर प्रदर्श पी-10 तैयार

    किया गया । विवेचना के दौरान साक्षियों के कथन लेखबद्ध किए गए तथा मोबाइल फोन की

    कॉल डिटेल प्राप्त की गई । जप्त सुसाइड नोट, वसीयत एवं अन्य प्रश्नाधीन दस्तावेजों को

    परीक्षण हेतु शासकीय दस्तावेज परीक्षक के पास भेजा गया तथा संपूर्ण विवेचना उपरांत

    अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया गया ।

    4. विचारण के दौरान आरोप के प्रमाणन हेतु अभियोजन की ओर से अपने पक्ष के समर्थन में

    कु ल 11 साक्षियों का परीक्षण कराया गया, 42 दस्तावेज प्रदर्श चिन्हांकित कराए गए तथा

    प्रश्नाधीन दस्तावेज क्रमांक-1 एवं 2 प्रस्तुत किए गए । धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के

    अंतर्गत दर्ज अपने कथन में अभियुक्ता श्रीमती रत्ना गुप्ता ने अपने विरुद्ध अभियोजन
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    साक्षियों के कथनों से इनकार करते हुए स्वयं को निर्दोष बताया है । अभियुक्ता ने यह भी

    कहा है कि प्रस्तुत कॉल डिटेल्स में उल्लिखित मोबाइल नंबर उसका नहीं है । उसका यह

    कहना है कि मृतक के रिश्तेदार, जो अभियोजन साक्षी हैं, मृतक की सम्पत्ति हड़पने के

    उद्देश्य से उसे झूठे प्रकरण में फँ सा रहे हैं, जबकि वह निर्दोष है । अभियुक्ता की ओर से

    बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया । तत्पश्चात् उभयपक्ष को सुना जाकर

    विचारण न्यायालय द्वारा प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय पारित किया गया । जिसे इस

    अपील में चुनौती दी गई है ।

    5. विचारण न्यायालय द्वारा अभियोजन साक्षी पार्षद श्याम साहू (अ.सा.-6), राजेन्द्र प्रसाद

    साहू (अ.सा.-5), संतोष कु मार गुप्ता (अ.सा.-3) आदि के कथन तथा विवेचक जवाहर

    सिंह पोर्ते (अ.सा.-2) द्वारा पुष्ट मर्ग सूचना प्रदर्श पी-2 एवं चिकित्सक सावन मुंदरी

    (अ.सा.-1) द्वारा पुष्ट शव परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श पी-6 के आधार पर यह निष्कर्ष

    निकाला गया है कि योगेश गुप्ता की मृत्यु आत्महत्या के स्वरूप की थी तथा गले में पाए गए

    लिगेचर मार्क के अनुसार उसकी मृत्यु श्वासावरोध के कारण हुई थी । मृतक योगेश गुप्ता

    द्वारा फांसी लगाकर आत्महत्या किया जाना अविवादित रहा है ।

    6. विचारण न्यायालय ने संपूर्ण साक्ष्य की समीक्षा करते हुए यह पाया है कि अभियुक्ता श्रीमती

    रत्ना गुप्ता के कथित अवैध संबंधों के संबंध में अभियोजन साक्षियों द्वारा जो कथन किए गए

    हैं, वे सभी मृतक योगेश गुप्ता के निकट संबंधी, अर्थात् उसकी माता, बड़ा भाई एवं बहनोई,

    हैं । इस संबंध में उनकी ओर से पूर्व में कभी कोई शिकायत किए जाने का तथ्य अभिलेख

    पर उपलब्ध नहीं है । विचारण न्यायालय ने यह भी पाया है कि एक सुसाइड नोट की

    जप्ती, जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-9 के अनुसार, मृतक के घर से होना दर्शाई गई है, जबकि
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    मौखिक साक्ष्य में उसकी जप्ती मृतक की जेब से होना बताया गया है । इसके अतिरिक्त,

    दूसरी मूल प्रति स्टील के डब्बे से बरामद होना बताया गया है, जबकि अभिलेख पर के वल

    एक ही सुसाइड नोट प्रस्तुत है तथा कथित कार्बन अथवा पेन की कोई जप्ती नहीं की गई

    है । विचारण न्यायालय ने यह भी पाया है कि कथित दहेज प्रताड़ना के संबंध में पूर्व में

    कभी कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई थी । इसी प्रकार, दूध वाले नान्ही, चिकित्सक

    सिकरवार एवं पड़ोसी ललित अग्रवाल के साथ अभियुक्ता के कथित अवैध संबंधों के संबंध

    में उनका कोई कथन दर्ज नहीं किया गया है । इस प्रकार, विचारण न्यायालय ने यह

    निष्कर्ष निकाला है कि अभियुक्ता के चरित्रहीन होने अथवा उसके किसी अनैतिक संबंध

    बाबत समुचित जांच नहीं की गई है ।

    7. विचारण न्यायालय ने यह भी पाया है कि मर्ग सूचना दिनांक 20/11/2013 की है, किं तु

    शव का पंचनामा अगले दिन, अर्थात् दिनांक 21/11/2013 को तैयार किया गया है ।

    अभिलेख से यह भी परिलक्षित होता है कि पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने से पूर्व ही

    राजेन्द्र द्वारा कथित रूप से दरवाज़े को मारकर तोड़ा गया था । तत्पश्चात् पुलिस को

    सूचना दी गई तथा पुलिस अगले दिन घटनास्थल पर पहुंची, किं तु इस संबंध में कोई पृथक

    पंचनामा तैयार नहीं किया गया है । विचारण न्यायालय ने यह भी पाया है कि योगेश गुप्ता

    की मृत्यु के पश्चात भी उसकी पत्नी, अभियुक्ता रत्ना गुप्ता, उसी घर में निवासरत रही,

    जिसका समर्थन स्वयं मृतक की माता ने अपने कथन में किया है । इसके अतिरिक्त, योगेश

    गुप्ता को अभियुक्ता रत्ना गुप्ता द्वारा प्रताड़ित किए जाने के संबंध में पूर्व में कभी कोई

    शिकायत नहीं की गई थी । अभिलेख से यह भी परिलक्षित होता है कि कथित घटना के

    पश्चात तेरहवीं के समय आयोजित पंचायत में मृत योगेश गुप्ता की सम्पत्ति उसकी 07

    वर्षीय पुत्री चंचल गुप्ता के साथ-साथ उसकी विधवा, अभियुक्ता रत्ना गुप्ता, के पक्ष में किए
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    जाने का निर्णय लिया गया था । जिससे यह परिलक्षित होता है कि उस समय अभियुक्ता

    श्रीमती रत्ना गुप्ता पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया था । विचारण न्यायालय ने यह भी

    पाया है कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत कॉल डिटेल्स रिपोर्ट विधिवत रूप से प्रमाणित नहीं

    कराई गई है । अभियुक्ता रत्ना गुप्ता के नाम से जिस मोबाइल नंबर का उपयोग होना बताया

    गया है, वह किसी अन्य व्यक्ति के नाम आवंटित पाया गया है । जिन अन्य व्यक्तियों के

    साथ श्रीमती रत्ना गुप्ता के कथित अनैतिक संबंध होना बताया गया है, न तो उनके मोबाइल

    फोन जप्त किए गए हैं और न ही इस संबंध में कोई स्वतंत्र प्रमाण प्रस्तुत किया गया है कि

    उनके मोबाइल पर क्या संवाद अथवा संपर्क था । साथ ही, कॉल डिटेल्स के माध्यम से

    भी यह प्रमाणित नहीं किया जा सका है कि अभियुक्ता श्रीमती रत्ना गुप्ता का उनसे बारम्बार

    दूरभाषीय संपर्क होता था । इसके अतिरिक्त, मृतक योगेश उर्फ पिंटू गुप्ता की नमूना

    लिखावट के रूप में उसके दूध के हिसाब-किताब संबंधी पंजी जप्त की गई थी । उक्त

    नमूना लिखावट का प्रश्नाधीन सुसाइड नोट एवं वसीयत से मिलान कर विशेषज्ञ साक्षी

    प्रकाश चंद्र त्रिवेदी (अ.सा.-11) द्वारा प्रदर्श पी-41 एवं पी-42 के रूप में परीक्षण

    प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया है, किं तु उसमें भी ऐसा कोई स्पष्ट अभिमत व्यक्त नहीं किया

    गया है कि दोनों लिखावट एक ही व्यक्ति की है । इन समस्त परिस्थितियों के आधार पर

    विचारण न्यायालय ने अभियुक्ता द्वारा मृतक को प्रताड़ित करने अथवा उसे आत्महत्या के

    लिए दुष्प्रेरित किए जाने के तथ्य को प्रमाणित न पाते हुए उसे दोषमुक्त किया है ।

    8. अपीलार्थी, जो मृतक का बड़ा भाई है, की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने तर्क

    प्रस्तुत किया है कि अपीलार्थी, उसकी माता तथा रिश्ते में उसके तीनों बहनोई ने अपने

    साक्ष्य में स्पष्ट रूप से यह कथन किया है कि घटना से पूर्व स्वयं योगेश कु मार गुप्ता उर्फ पिंटू

    ने उन्हें यह जानकारी दी थी कि उसकी पत्नी, अभियुक्ता रत्ना गुप्ता, के तीन व्यक्तियों के
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    साथ अवैध संबंध हैं तथा वह उसे यह धमकी देती थी कि यदि वह अपनी सम्पत्ति उसके

    नाम नहीं करेगा, तो वह उसे एवं उसके परिवारजनों को दहेज प्रताड़ना के प्रकरण में

    फँ साकर जेल भिजवा देगी । यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि उक्त तथ्य की पुष्टि

    कथित सुसाइड नोट से भी होती है, जिसमें उन तीनों व्यक्तियों के मोबाइल नंबर भी अंकित

    हैं, जिनके साथ अभियुक्ता श्रीमती रत्ना गुप्ता के अनैतिक संबंध होना बताया गया है ।

    हस्तलिपि विशेषज्ञ ने भी अपने अभिमत में यह उल्लेख किया है कि दूध के हिसाब-किताब

    हेतु संधारित पंजी, जिसे नमूना लिखावट के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उससे विवादित

    सुसाइड नोट एवं वसीयत के कु छ अंश मेल खाते हैं । इस प्रकार, अभियोजन साक्षियों के

    कथनों को अविश्वसनीय मानने का कोई कारण नहीं है तथा अभियोजन का मामला

    प्रमाणित है । यह भी तर्क दिया गया है कि यदि विवेचना में कोई कमी रह गई हो, तो मात्र

    उस आधार पर पीड़ित पक्ष को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता । इस संदर्भ में

    विद्वान अधिवक्ता ने न्यायदृष्टांत के रूप में Amar Nath Chaubey v. Union of India

    and Others, (2021) 11 SCC 804 तथा Edakkandi Dineshan @ P. Dineshan

    & Others v. State of Kerala, (2025) 3 SCC 273 में प्रतिपादित विधि सिद्धांतों का

    हवाला देते हुए निवेदन किया है कि विचारण न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्य का समुचित

    मूल्यांकन नहीं किया और प्रश्नाधीन निर्णय पारित कर अभियुक्ता को दोषमुक्त कर दिया ।

    अतः प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय त्रुटिपूर्ण होने से स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है ।

    फलस्वरूप, अपील स्वीकार कर दोषमुक्ति का निर्णय अपास्त किया जाए तथा अभियुक्ता

    को दोषसिद्ध कर विधि अनुसार दण्डित किया जाए ।

    9. राज्य/उत्तरवादी क्रमांक-1 की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया है

    कि अभियोजन ने मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के माध्यम से अपने मामले को संदेह से परे
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    प्रमाणित किया गया है, तथापि विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्ति का निर्णय विधि

    की दृष्टि में उचित नहीं है । अतः अपील स्वीकार की जाए ।

    10. अभियुक्ता/उत्तरवादी क्रमांक-2 की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत

    किया है कि विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय उपलब्ध साक्ष्य की सम्यक् एवं उचित

    समीक्षा पर आधारित है । अभियोजन का मामला संदेह से परिपूर्ण है । ऐसी परिस्थिति में

    विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्ति का निर्णय विधिसम्मत एवं उचित है । अपीलार्थी

    पक्ष का तर्क स्वीकार योग्य नहीं है । अतः अपील खारिज की जाए ।

    11. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।

    12. न्यायदृष्टांत Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 में

    माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत अपील के निराकरण हेतु कु छ

    न्यायिक सिद्घांत प्रतिपादित किए गए हैं जो कण्डिका-42 में निम्नानुसार हैः-

    “42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the

    promise that no innocent shall be condemned as guilty. All

    the safeguards and the jurisprudential values of criminal

    law, are intended to prevent any failure of justice. The

    principles which come into play while deciding an appeal

    from acquittal could be summarised as:

    (i) Appreciation of evidence is the core element of a
    criminal trial and such appreciation must be
    comprehensive inclusive of all evidence, oral or
    documentary;

    (ii) Partial or selective appreciation of evidence may
    result in a miscarriage of justice and is in itself a
    ground of challenge;

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    (iii) If the court, after appreciation of evidence, finds
    that two views are possible, the one in favour of
    the accused shall ordinarily be followed;

    (iv) If the view of the trial court is a legally plausible
    view, mere possibility of a contrary view shall not
    justify the reversal of acquittal;

    (v) If the appellate court is inclined to reverse the
    acquittal in appeal on a reappreciation of
    evidence, it must specifically address all the
    reasons given by the trial court for acquittal and
    must cover all the facts;

    (vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the
    appellate court must demonstrate an illegality,
    perversity or error of law or fact in the decision of the
    trial court.”

    13. इसमें कोई संदेह नहीं है कि योगेश गुप्ता की मृत्यु आत्महत्या के स्वरूप की रही है । घटना

    दिनांक 20/11/2013 की है तथा मर्ग सूचना भी उसी दिन दर्ज की गई है, किं तु शव

    पंचनामा दिनांक 21/11/2013 को तैयार किया गया है । साथ ही, विवेचक उपनिरीक्षक

    जवाहर सिंह पोर्ते (अ.सा.-2) के कथन के अनुसार, वह घटनास्थल पर अगले दिन पहुंचा

    था । कथित सुसाइड नोट, जिसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया गया है उसकी जप्ती भी दूसरे

    दिन 21/11/2013 की है । अतः इस मामले में विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या योगेश

    उर्फ पिंटू गुप्ता ने अपनी पत्नी, श्रीमती रत्ना गुप्ता, के दुष्प्रेरण के फलस्वरूप आत्महत्या की

    थी ?

    14. In the matter of Naresh Kumar v. State of Haryana reported in (2024) 3

    SCC 573, Hon’ble Supreme Court has been principally laid down the

    factum of abetment of suicide and held that there should be clear and

    reliable evidence for abetment, which shows that after abetment, there

    was no other option left for suicide. Hon’ble Supreme Court has held as

    under:

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    “15. Section 306 of the IPC reads as under :-

    “306. Abetment of suicide.─If any person commits
    suicide, whoever abets the commission of such
    suicide, shall be punished with imprisonment of
    either description for a term which may extend to
    ten years, and shall also be liable to fine.”

    16. Thus, the basic ingredients to constitute an offence
    under Section 306 of the IPC are suicidal death and
    abetment thereof. Abetment of a thing is defined under
    Section 107 IPC as under:-

    “107. Abetment of a thing.─A person abets the
    doing of a thing, who─

    First.─Instigates any person to do that thing; or

    Secondly.─Engages with one or more other person
    or persons in any conspiracy for the doing of that
    thing, if an act or illegal omission takes place in
    pursuance of that conspiracy, and in order to the
    doing of that thing; or

    Thirdly.─Intentionally aids, by any act or illegal
    omission, the doing of that thing.

    Explanation 1.─ A person who by wilful
    misrepresentation, or by wilful concealment of a
    material fact which he is bound to disclose,
    voluntarily causes or procures, or attempts to
    cause or procure, a thing to be done, is said to
    instigate the doing of that thing.

    Explanation 2.─ Whoever, either prior to or at the
    time of the commission of an act, does anything in
    order to facilitate the commission of that act, and
    thereby facilitate the commission thereof, is said
    to aid the doing of that act.”

    17. This Court in Geo Varghese v. State of Rajasthan,
    (2021) 19 SCC 144, has considered the provisions of
    Section 306 IPC along with the definition of abetment
    under Section 107 IPC observed as under:-

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    {Acq. A. No.-169 of 2015}

    “14. Section 306 of IPC makes abetment of
    suicide a criminal offence and prescribes
    punishment for the same. …

    15. The ordinary dictionary meaning of the
    word ‘instigate’ is to bring about or initiate, incite
    someone to do something. This Court in Ramesh
    Kumar v. State of Chhattisgarh
    (2001) 9 SCC 618,
    has defined the word ‘instigate’ as under:-

    “20. Instigation is to goad, urge forward,
    provoke, incite or encourage to do “an
    act”.”

    16. The scope and ambit of Section 107 IPC and
    its co-relation with Section 306 IPC has been
    discussed repeatedly by this Court. In the case of
    S.S. Cheena v. Vijay Kumar Mahajan (2010) 12
    SCC 190, it was observed as under:-

    “25. Abetment involves a mental process
    of instigating a person or intentionally
    aiding a person in doing of a thing.
    Without a positive act on the part of the
    accused to instigate or aid in committing
    suicide, conviction cannot be sustained.
    The intention of the legislature and the
    ratio of the cases decided by the
    Supreme Court is clear that in order to
    convict a person under Section 306 IPC
    there has to be a clear mens rea to
    commit the offence. It also requires an
    active act or direct act which led the
    deceased to commit suicide seeing no
    option and that act must have been
    intended to push the deceased into such
    a position that he committed suicide.”

    18. This Court in M. Arjunan v. State, represented by its
    Inspector of Police, (2019) 3 SCC 315, while explaining
    the necessary ingredients of Section 306 IPC in detail,
    observed as under:-

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    {Acq. A. No.-169 of 2015}

    “7. The essential ingredients of the offence
    under Section 306 I.P.C. are: (i) the
    abetment; (ii) the intention of the accused to
    aid or instigate or abet the deceased to
    commit suicide. The act of the accused,
    however, insulting the deceased by using
    abusive language will not, by itself, constitute
    the abetment of suicide. There should be
    evidence capable of suggesting that the
    accused intended by such act to instigate the
    deceased to commit suicide. Unless the
    ingredients of instigation/abetment to
    commit suicide are satisfied, accused cannot
    be convicted under Section 306 IPC.”

    19. This Court in Ude Singh v. State of Haryana, (2019) 17
    SCC 301, held that in order to convict an accused
    under Section 306 IPC, the state of mind to commit a
    particular crime must be visible with regard to
    determining the culpability.

    20. This Court in Mariano Anto Bruno v. The Inspector of
    Police
    , (2023) 15 SCC 560, after referring to the
    abovereferred decisions rendered in context of
    culpability under Section 306 IPC observed as under:-

    “45. ……It is also to be borne in mind that
    in cases of alleged abetment of suicide, there
    must be proof of direct or indirect acts of
    incitement to the commission of suicide.
    Merely on the allegation of harassment
    without their being any positive action
    proximate to the time of occurrence on the
    part of the accused which led or compelled
    the person to commit suicide, conviction in
    terms of Section 306 IPC is not sustainable.”

    21. This Court in Gurcharan Singh v. State of Punjab,
    (2020) 10 SCC 200, observed that whenever a person
    instigates or intentionally aids by any act or illegal
    omission, the doing of a thing, a person can be said to
    have abetted in doing that thing. To prove the offence
    of abetment, as specified under Section 107 IPC, the
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    state of mind to commit a particular crime must be
    visible, to determine the culpability.

    22. This Court in Kashibai v. The State of Karnataka,
    92023) 15 SCC 751, observed that to bring the case
    within the purview of ‘Abetment’ under Section 107
    IPC, there has to be an evidence with regard to the
    instigation, conspiracy or intentional aid on the part of
    the accused and for the purpose proving the charge
    under Section 306 IPC, also there has to be an evidence
    with regard to the positive act on the part of the
    accused to instigate or aid to drive a person to commit
    suicide.

    15. इस मामले में संपूर्ण साक्ष्य से यह स्थिति स्पष्ट है कि अभियुक्ता रत्ना गुप्ता के विरुद्ध कथन

    करने वाले अपीलार्थी संतोष गुप्ता (अ.सा.-3), मृतक की माता गंगोत्री गुप्ता (अ.सा.-4),

    बहनोई राज किशोर गुप्ता (अ.सा.-7), नागेन्द्र कु मार गुप्ता (अ.सा.-8) तथा राजेश गुप्ता

    (अ.सा.-10), सभी मृतक के निकटतम रिश्तेदार हैं ।

    16. संतोष गुप्ता (अ.सा.-3) ने अपने कथन में यह स्वीकार किया है कि योगेश गुप्ता की मृत्यु के

    पश्चात भी उसकी पत्नी, अभियुक्ता रत्ना गुप्ता, सरकण्डा स्थित उसी मकान में निवासरत

    थी तथा अभियुक्ता द्वारा दी गई कथित प्रताड़ना अथवा धमकी के संबंध में उन्होंने पुलिस में

    कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी । उसने यह भी स्वीकार किया है कि मृतक की तेरहवीं

    के अवसर पर सामाजिक बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें मृतक की सम्पत्ति उसकी पुत्री

    चंचल एवं पत्नी, अर्थात् अभियुक्ता रत्ना गुप्ता, को दिए जाने का निर्णय लिया गया था ।

    उसने यह भी स्वीकार किया है कि तेरहवीं के पश्चात भी उसकी माता तथा बहनें सरकण्डा

    स्थित उसी मकान में ही निवासरत रहीं ।

    17. मृतक की माता गंगोत्री गुप्ता (अ.सा.-4) ने अपने कथन में यह स्वीकार किया है कि घटना

    वाले दिन सुबह अभियुक्ता रत्ना गुप्ता बाजार गई थी तथा उसके साथ उसकी पुत्री चंचल
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    गुप्ता भी बाजार गई थी । इस प्रकार, घटना के ठीक पूर्व अभियुक्ता द्वारा मृतक को कब और

    किस प्रकार प्रताड़ित किया गया था, इस संबंध में कोई स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है ।

    गंगोत्री गुप्ता (अ.सा.-4) ने यह भी स्वीकार किया है कि घटना के पश्चात मृतक की पुत्री

    चंचल गुप्ता की अभिरक्षा प्राप्त करने हेतु उसकी बड़ी पुत्री, जो उड़ीसा में निवास करती है,

    द्वारा उत्तराधिकार संबंधी कार्यवाही की गई है । उसने यह भी स्वीकार किया है कि घटना

    के पूर्व गर्मी के दिनों में मृतक का पेट दर्द संबंधी उपचार बिलासपुर स्थित अपोलो अस्पताल

    में चला था तथा उपचार कराने के लिए वह अपनी पत्नी रत्ना गुप्ता के साथ अपनी बड़ी

    बहन, जो उड़ीसा में रहती है, के यहां भी गया था । गंगोत्री गुप्ता (अ.सा.-4) ने यह भी

    स्वीकार किया है कि मृतक की तेरहवीं के अवसर पर पंचों की बैठक आयोजित हुई थी ।

    उसने यह भी स्वीकार किया है कि कथित प्रताड़ना अथवा धमकी के संबंध में उन्होंने कभी

    कोई शिकायत नहीं की थी ।

    18. बहनोई राज किशोर गुप्ता (अ.सा.-7) ने अपने कथन में यह स्वीकार किया है कि अभियुक्ता

    रत्ना गुप्ता के अन्य व्यक्तियों से संबंध होने संबंधी तथ्य उसके पुलिस कथन प्रदर्श डी-3 में

    उल्लेखित नहीं है । अन्य बहनोई नागेन्द्र कु मार गुप्ता (अ.सा.-9) ने यह स्वीकार किया है

    कि कथित प्रताड़ना अथवा धमकी के संबंध में उन्होंने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी ।

    पेशे से अधिवक्ता राजेश गुप्ता (अ.सा.-10) ने भी यह स्वीकार किया है कि अभियुक्ता के

    दुष्प्रेरण के कारण योगेश गुप्ता द्वारा आत्महत्या किए जाने के संबंध में उन्होंने पुलिस में कोई

    शिकायत दर्ज नहीं कराई थी । इस प्रकार, कथित घटना के पूर्व लगभग 08 वर्षों तक

    अभियुक्ता और मृतक के मध्य पति-पत्नी का संबंध रहने के दौरान उनके बीच किसी प्रकार

    का विवाद उत्पन्न हुआ हो, ऐसा कोई स्पष्ट तथ्य साक्ष्य में परिलक्षित नहीं होता है ।
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    19. घटना दिनांक 20/11/2013 की है । शव का पंचनामा अगले दिन, अर्थात् दिनांक

    21/11/2013 को तैयार किया गया है । कथित सुसाइड नोट की जप्ती भी दिनांक

    21/11/2013 की ही बताई गई है, किं तु वह मृतक की जेब से जप्त किया गया था अथवा

    उसके मकान के किस स्थान से बरामद किया गया था, इस संबंध में जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-

    9 में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है । अभिलेख में प्रश्नाधीन दस्तावेज क्रमांक-1 एवं 2 को

    सुसाइड नोट की मूल प्रति होना दर्शाया गया है, किं तु साक्ष्य में उसकी कार्बन प्रति होने की

    बात भी सामने आई है । तथापि, उक्त कार्बन प्रति की कोई पृथक जप्ती अभिलेख पर

    उपलब्ध नहीं है । विवेचक उपनिरीक्षक जवाहर सिंह पोर्ते (अ.सा.-2) ने अपने कथन में

    यह स्वीकार किया है कि जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-9 में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि सुसाइड

    नोट मृतक की जेब से बरामद किया गया हो । उसने यह भी स्वीकार किया है कि उसके

    द्वारा किसी कार्बन अथवा पेन की जप्ती नहीं की गई है । विवेचक ने यह भी स्वीकार किया

    है कि इस संबंध में कोई जांच नहीं की गई कि अभियुक्ता रत्ना गुप्ता के अन्य पुरुषों के साथ

    अवैध अथवा अनैतिक संबंध थे अथवा नहीं । उसने यह भी स्वीकार किया है कि मर्ग

    कायम किए जाने के पश्चात जांच उपरांत 23 दिन बाद प्रथम सूचना पत्र दर्ज की गई थी ।

    20. अन्य विवेचक के रूप में उपनिरीक्षक प्रभाकर तिवारी (अ.सा.-8) द्वारा कॉल डिटेल्स

    रिपोर्ट, प्रदर्श पी-13 से प्रदर्श पी-34 तक, प्रस्तुत की गई है, किं तु वह भारतीय साक्ष्य

    अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप विधिवत प्रमाणित नहीं है तथा उसके संबंध में

    आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया है । अभियुक्ता से किसी मोबाइल फोन की

    जप्ती किया जाना भी अभिलेख पर प्रदर्शित नहीं है तथा वह किस मोबाइल नंबर अथवा

    उपकरण का उपयोग करती थी, यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है । इसी प्रकार, हस्तलिपि

    विशेषज्ञ द्वारा भी निश्चित एवं स्पष्ट प्रकृ ति का अभिमत व्यक्त नहीं किया गया है ।
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    21. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा अमर नाथ चौबे (उपरोक्त) तथा एडक्कण्डी दिनेशन

    उर्फ पी. दिनेशन (उपरोक्त) में प्रतिपादित विधि सिद्धांतों का अवलंब लिया गया है ।

    अभिलेख के परिशीलन से स्पष्ट है कि अमर नाथ चौबे (उपरोक्त) के प्रकरण में माननीय

    उच्चतम न्यायालय द्वारा अग्रेतर विवेचना के प्रश्न पर विचार किया गया था, जबकि

    विचाराधीन प्रकरण में न के वल विवेचना पूर्ण कर अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया जा चुका है,

    बल्कि विचारण उपरांत अभियुक्ता के पक्ष में दोषमुक्ति का निर्णय भी पारित हो चुका है । ऐसी

    परिस्थिति में उक्त न्यायदृष्टांत के तथ्य वर्तमान प्रकरण से भिन्न होने के कारण उसका कोई

    समर्थन अपीलार्थी पक्ष को प्राप्त नहीं होता है ।

    22. इसी प्रकार, एडक्कण्डी दिनेशन उर्फ पी. दिनेशन (उपरोक्त) के प्रकरण में माननीय

    उच्चतम न्यायालय द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि मात्र विवेचना अधिकारी की त्रुटि

    अथवा लापरवाही के आधार पर अभियोजन के मामले को अस्वीकार नहीं किया जा सकता

    तथा उपलब्ध साक्ष्य का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया जाना आवश्यक है । किं तु

    विचाराधीन प्रकरण में के वल विवेचना संबंधी कमियां ही नहीं पाई गई हैं, बल्कि अभियोजन

    के संपूर्ण मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य में भी अनेक महत्वपूर्ण विसंगतियां, अभाव एवं

    संदेहास्पद परिस्थितियां परिलक्षित होती हैं, जिनके आधार पर अभियुक्ता के विरुद्ध

    दोषसिद्धि का निष्कर्ष अभिलिखित करने हेतु पर्याप्त, स्पष्ट एवं विश्वसनीय साक्ष्य का अभाव

    है । अतः उक्त न्यायदृष्टांत का लाभ भी अपीलार्थी पक्ष को प्राप्त नहीं होता है ।

    23. इस प्रकार, विधिक प्रावधान, न्यायदृष्टांत तथा साक्ष्य की विवेचना के फलस्वरूप यह

    न्यायालय पाती है कि अभिलेख में उपलब्ध, तथ्य और साक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुए

    विचारण न्यायालय द्वारा जो दोषमुक्ति का निर्णय पारित किया है उसमें कोई अवैधता या

    अशुद्घता नहीं है । इसलिए उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती ।
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    {Acq. A. No.-169 of 2015}

    24. अतः दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत यह अपील स्वीकार योग्य न होने से खारिज की जाती है ।

    25. निर्णय की प्रतिलिपि के साथ विचारण न्यायालय को अभिलेख शीघ्रतापूर्वक वापस प्रेषित

    हो ।

    सही/-

    (संजय कु मार जायसवाल)
    न्यायाधीश

    पोमन

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