Chattisgarh High Court
Sandeep @ Prashant Vaishnav vs State Of Chhattisgarh on 11 March, 2026
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
2026:CGHC:11650
प्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
निर्णय सुरक्षित दिनांक-03/03/2026
निर्णय उद्घोषित दिनांक-11/03/2026
दाण्डिक अपील क्रमांक-411/2024
सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव पिता-भुदेव ध्रुव, उम्र-लगभग 18 वर्ष, निवासी-अरौटीपारा बलभद्र
वार्ड, भाटापारा, पुलिस थाना-भाटापारा, जिला-बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरगांव, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
सहित
दाण्डिक अपील क्रमांक-467/2024
प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू पिता-संतोष साहू, उम्र-लगभग 20 वर्ष,
निवासी-कल्याण सागर पारा, पुलिस थाना-भाटापारा, जिला-बलौदाबाजार-भाटापारा,
छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरगांव, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
Digitally
signed by
POMAN
POMAN DEWANGAN
DEWANGAN Date:
2026.03.11
16:20:57
+0530
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
सहित
दाण्डिक अपील क्रमांक-529/2024
कान्हा उर्फ वेदप्रकाश नागरची पिता-यशवंत नागरची, उम्र-लगभग 20 वर्ष,
निवासी-रेस्ट हाउस के पीछे, नयापारा, भाटापारा, पुलिस थाना-भाटापारा (शहर),
जिला-बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा थाना प्रभारी, पुलिस थाना-सरगांव, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
सहित
दाण्डिक अपील क्रमांक-930/2024
संदीप उर्फ प्रशांत वैष्णव पिता-ललित वैष्णव, उम्र-लगभग 19 वर्ष, निवासी-वार्ड
संख्या-18, संतमाता कर्मा वार्ड, भाटापारा, पुलिस थाना-भाटापारा (शहर), जिला-
बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरगांव, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
सहित
दाण्डिक अपील क्रमांक-1795/2024
विवेक ध्रुव पिता-दिलीप, उम्र-लगभग 20 वर्ष, निवासी-पंचशील नगर, गुरूनानक वार्ड,
भाटापारा, पुलिस थाना-भाटापारा (शहर), जिला-बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरगांव, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
एवं
दाण्डिक अपील क्रमांक-1809/2024
असलम उर्फ अंकु श मडामे पिता-मेथा, उम्र-लगभग 20 वर्ष, निवासी-वार्ड संख्या-18,
संतमाता कर्मा वार्ड, भाटापारा, पुलिस थाना-भाटापारा (शहर), जिला-बलौदाबाजार-
भाटापारा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरगांव, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
अपीलार्थी सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव द्वारा : श्री ऋषि राहुल सोनी, अधिवक्ता ।
अपीलार्थी प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू द्वारा : श्री भरत लाल डेम्ब्रा, अधिवक्ता ।
अपीलार्थी कान्हा उर्फ वेदप्रकाश नागरची द्वारा : श्री विजय शंकर मिश्रा, अधिवक्ता ।
अपीलार्थी संदीप उर्फ प्रशांत वैष्णव द्वारा : श्री विकास कु मार पाण्डेय, अधिवक्ता ।
अपीलार्थी विवेक ध्रुव द्वारा : श्री विकास कु मार पाण्डेय, अधिवक्ता ।
अपीलार्थी असलम उर्फ अंकु श मडामे द्वारा : श्री ऋषि राहुल सोनी, अधिवक्ता ।
राज्य/उत्तरवादी द्वारा : श्री सुमित सिंह, उप महाधिवक्ता ।
न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
!! सी.ए.वी. निर्णय !!
1.
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-374 (2) के तहत प्रस्तुत इस दाण्डिक अपील
में, विचारण न्यायालय-प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, मुंगेली, जिला-मुंगेली, छत्तीसगढ़
द्वारा सत्र प्रकरण क्रमांक-31/2023 “छत्तीसगढ़ राज्य विरूद्घ असलम उर्फ अंकु श
मडामे वगैरह” में पारित निर्णय दिनांक-06/02/2024 को चुनौती दी गई है । जिसके
तहत अपीलार्थीगण को निम्नानुसार दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है । जिसे आगे संक्षेप
में “प्रश्नाधीन निर्णय” से संबोधित किया जा रहा हैः-
अपीलार्थी का नाम दोषसिद्धि दण्डादेश
सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव 01 माह का कारावास एवं
100/-रूपये का अर्थदण्ड
प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू धारा-341/149 तथा अर्थदण्ड राशि अदा न
भारतीय दण्ड संहिता, करने की दशा में 07 दिन
कान्हा उर्फ वेदप्रकाश नागरची
1860 का अतिरिक्त कारावास की
सजा से दण्डित किया
संदीप उर्फ प्रशांत वैष्णव
गया ।
विवेक ध्रुव धारा-397/394 07 वर्ष का सश्रम
भारतीय दण्ड संहिता, कारावास की सजा से
असलम उर्फ अंकु श मडामे
दण्डित किया गया ।
1860
धारा-307/149 07 वर्ष का सश्रम
भारतीय दण्ड संहिता, कारावास एवं 500/-
रूपये का अर्थदण्ड तथा
1860
अर्थदण्ड राशि अदा न
करने की दशा में 01 माह
का अतिरिक्त सश्रम
कारावास की सजा से
दण्डित किया गया ।
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
01 वर्ष का कारावास एवं
500/- रूपये का
धारा-25(1)(1-ख) अर्थदण्ड तथा अर्थदण्ड
आयुध अधिनियम, राशि अदा न करने की दशा
1959 में 01 माह का अतिरिक्त
कारावास की सजा से
दण्डित किया गया ।
प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू
03 वर्ष का कारावास एवं
असलम उर्फ अंकु श मडामे 500/- रूपये का
अर्थदण्ड तथा अर्थदण्ड
धारा-27(1) आयुध
राशि अदा न करने की दशा
अधिनियम, 1959
में 01 माह का अतिरिक्त
कारावास की सजा से
दण्डित किया गया ।
सभी मूल सजाएं साथ-साथ चलेंगी ।
2. अभियोजन मामला, संक्षेप में, इस प्रकार है कि दिनांक 05/05/2023 को प्रातः
06:20 बजे प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) अपने साथियों सीताराम साहू
(अ.सा.-2), तेज बहादुर (अ.सा.-3) एवं संतोष तिवारी (अ.सा.-5) के साथ
मोटरसाइकिल सी.डी. डिलक्स क्रमांक सीजी-04-एलएक्स-9306 में ग्राम सांवतपुर से
सरगांव होते हुए लमती की ओर जा रहे थे । जब वे राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 130 पर ग्राम
किरना स्थित आरती ढाबा के समीप पहुँचे, तभी पीछे से दो मोटरसाइकिल पर सवार
अपीलार्थीगण आए और आगे निकलते हुए उन्हें रोककर गाली-गलौज करने लगे । उनमें
से एक व्यक्ति ने संतोष तिवारी (अ.सा.-5) को तथा दूसरे ने सीताराम साहू (अ.सा.-2)
को चाकू से वार किया जिससे उन्हें चोटें आयी । जब वे वहाँ से भागने का प्रयास करने
लगे, तब अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण ने उनका पीछा कर उन्हें पकड़ लिया । इस दौरान
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन की जेब से ₹500/-, उनकी मोटरसाइकिल, संतोष तिवारी की
जेब से ₹1,000/- तथा उसका स्पर्श-पट (टच-स्क्रीन) मोबाइल फोन लूट लिए ।
उक्त मारपीट के फलस्वरूप संतोष तिवारी के पेट में तथा सीताराम साहू की बाईं जांघ में
चोट आई । प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन द्वारा घटना की रिपोर्ट उसी दिन थाना सरगांव में
दर्ज कराए जाने पर अपराध क्रमांक 72/2023 पंजीबद्ध किया गया ।
3. विवेचना के दौरान उनके प्रकटीकरण कथन के आधार पर अभियुक्त विवेक ध्रुव से
रामस्वरूप देवांगन का एक आधार कार्ड एवं ₹300/- नगद (प्रदर्श पी-11), अभियुक्त
प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू से एक स्टील का बटनदार चाकू एवं मोटरसाइकिल होंडा
सी.डी. 100 ड्रीम (प्रदर्श पी-12), अभियुक्त संदीप उर्फ प्रशांत वैष्णव से मोटरसाइकिल
हीरो एच.एफ. डिलक्स (प्रदर्श पी-13), अभियुक्त सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव से मोटरसाइकिल
हीरो स्प्लेंडर प्रो (प्रदर्श पी-14) तथा अभियुक्त असलम उर्फ अंकु श मडामे से एक स्टील
का बटनदार चाकू (प्रदर्श पी-15) जप्त किए गए । दिनांक 06/05/2023 को तहसील
कार्यालय सरगांव में प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) से अभियुक्त प्रियांशु साहू उर्फ
स्वयं राजा साहू, संदीप उर्फ प्रशांत वैष्णव, कान्हा उर्फ वेदप्रकाश नागरची एवं विवेक ध्रुव
की पहचान कराई गई, जिसकी कार्यवाही प्रदर्श पी-33 के रूप में अंकित है । तत्पश्चात
दिनांक 20/05/2023 को तहसील कार्यालय सरगांव में ही प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन से
अभियुक्त सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव एवं असलम उर्फ अंकु श मडामे की पहचान कार्यवाही कराई
गई, जिसकी कार्यवाही प्रदर्श पी-4 के रूप में अंकित है । विवेचना के दौरान साक्षियों के
कथन लिए गए, मौका-नक्शा तैयार किया गया तथा संपूर्ण विवेचना उपरांत अभियुक्तगण
के विरुद्ध अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया गया ।
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
4. आरोप प्रमाणन वास्ते विचारण न्यायालय के समक्ष अभियोजन की ओर से अपने पक्ष
समर्थन में 14 साक्षियों का परीक्षण तथा 48 दस्तावेज प्रदर्श चिन्हांकित करवाये गये ।
धारा-313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कथन में अपीलार्थीगण ने अपने विपरीत साक्षियों
के कथनों को इनकार करते हुए कहा है कि वे निर्दोष हैं तथा उन्हें झूठा फँ साया गया है ।
बचाव में उनकी ओर से कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया । उभयपक्ष काे सुना जाकर
विचारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण को इस निर्णय की कण्डिका-1 के
अनुसार दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है । जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।
5. अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्तागण का तर्क है कि घटना के दिन ही दर्ज कराई गई प्रथम
सूचना पत्र में किसी भी अभियुक्त का नाम अंकित नहीं है । अपीलार्थीगण के विरुद्ध
अभियोजन का मामला मुख्यतः उनके विरुद्ध कराई गई शिनाख़्त कार्यवाही पर आधारित
है । इस संबंध में प्रदर्श पी-33 दिनांक 06/05/2023 को तथा प्रदर्श पी-4 दिनांक
20/05/2023 को आयोजित की गई, किं तु उक्त दोनों ही शिनाख़्त कार्यवाही के वल
प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) से ही कराई गई, शेष प्रार्थी या प्रत्यक्ष साक्षियों से
नहीं करायी गयी । शिनाख़्त कार्यवाही में न तो पर्याप्त संख्या में समान प्रकृ ति के अन्य
व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया और न ही प्रत्येक अभियुक्त की शिनाख़्त पृथक-पृथक
एवं विधि सम्मत ढंग से कराई गई । इसके अतिरिक्त यह तथ्य भी स्वयं शिनाख़्तकर्ता
प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) ने स्वीकार किया है कि अभियुक्तों को उसे, शिनाख़्त
कार्यवाही से पूर्व ही दिखा दिया गया था । ऐसी परिस्थिति में उक्त शिनाख़्त कार्यवाही की
निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता संदेहास्पद हो गयी है । इस संदर्भ में इस न्यायालय द्वारा
प्रतिपादित न्यायदृष्टांत Pramod v. State of Chhattisgarh with other connected
matters, 2024 SCC OnLine Chh 3080 का हवाला दिया है जिसके अनुसार यदि
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
अभियुक्त, गवाह को पूर्व में दिखा दिया गया हो अथवा शिनाख़्त कार्यवाही विधिसम्मत ढंग
से न कराई गई हो, तो ऐसी शिनाख़्त कार्यवाही अविश्वसनीय एवं अवैध मानी जाती है ।
अतः उक्त परिस्थितियों में अभियोजन का संपूर्ण मामला संदेहास्पद हो गया है ।
6. अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्तागण का आगे तर्क है कि दोषसिद्धि का दूसरा प्रमुख
आधार यह है कि अपीलार्थीगण से लूट की रकम, मोटरसाइकिल, आधार कार्ड तथा घटना
में प्रयुक्त चाकू की जब्ती है । अपीलार्थीगण के प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती के साक्षी
भुवनेश्वर कौशिक (अ.सा.-8) ने उक्त कार्यवाही की पुष्टि नहीं की है । दूसरे साक्षी राजा
कौशिक (अ.सा.-6) ने यह स्वीकार किया है कि उसने सभी हस्ताक्षर एक ही समय पर
थाने में किए थे तथा उसने भी विधि के अनुसार अभियुक्तगण के प्रकटीकरण कथन एवं
जब्ती का स्पष्ट समर्थन नहीं किया है । इसके अतिरिक्त उक्त प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती
कार्यवाही को तैयार करने वाले निरीक्षक विवेचक प्रमोद डनसेना (अ.सा.-14) के कथन
से भी प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती कार्यवाही विधिवत प्रमाणित नहीं होती है । इस संबंध
में अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा Babu Sahebagouda Rudragoudar And
Others v. State of Karnataka, (2024) 8 SCC 149 के न्यायदृष्टांत का हवाला
दिया गया है, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि यदि प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती की
कार्यवाही विधि के अनुसार प्रमाणित न हो, तो उसका साक्ष्य संदिग्ध हो जाता है ।
इसके अतिरिक्त यह भी तर्क किया गया है कि प्रार्थी पक्ष द्वारा जिस मोटरसाइकिल की लूट
होना बताया गया है, अभियोजन यह स्थापित करने में असफल रहा है कि कथित रूप से
जब्त मोटरसाइकिल वही है जो घटना में लूटी गई थी । अभियुक्त असलम उर्फ अंकु श
मडामे तथा अभियुक्त प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू से चाकू की जब्ती भी विधिवत्
प्रमाणित नहीं है । अभियुक्त विवेक ध्रुव से नगद रकम की जब्ती दर्शाई गई है, किं तु यह
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
स्थापित नहीं किया जा सका है कि उक्त रकम वही लूटी गई राशि है । अभियुक्त विवेक
ध्रुव से प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन का आधार कार्ड जब्त होना बताया गया है, जबकि स्वयं
रामस्वरूप देवांगन ने अपने कथन में आधार कार्ड के लूटे जाने अथवा खो जाने की कोई
बात नहीं कही है । अपीलार्थीगण का अपराध से प्रत्यक्ष एवं सीधा संबंध स्थापित करने में
अभियोजन असफल रहा है । ऐसी स्थिति में “प्रश्नाधीन दोषसिद्धि एवं दण्डादेश” का
निर्णय विधि की दृष्टि में वैध और उचित न होने से स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है । अतः
अपील स्वीकार कर “प्रश्नाधीन दोषसिद्धि एवं दण्डादेश” का निर्णय अपास्त करते हुए
अपीलार्थीगण को दोषमुक्त किया जाए ।
7. उत्तरवादी/राज्य की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता ने अपीलार्थीगण का विरोध करते
हुए तर्क दिया है कि अभियोजन साक्षियों ने पूर्ण रूप से अभियोजन मामले का समर्थन
किया है जिनपर अविश्वास किये जाने का कोई कारण नहीं है । विचारण न्यायालय का
“प्रश्नाधीन निर्णय” साक्ष्य की उचित समीक्षा पर आधारित है । अभियोजन ने
अपीलार्थीगण के विरूद्घ अपना मामला संदेह से परे प्रमाणित किया है । अपीलार्थी पक्ष
द्वारा अपील में उठाये गये तर्क स्वीकार योग्य नहीं है । अतः अपील खारिज किया जाये ।
8. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।
9. घटना दिनांक 05/05/2023 की है । प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) ने अपने
न्यायालयीन कथन में बताया है कि वह सीताराम साहू (अ.सा.-2), तेज बहादुर
(अ.सा.-3) तथा संतोष तिवारी (अ.सा.-5) के साथ अपने ससुराल ग्राम सांवतपुर से
ग्राम टेमरी की ओर जा रहा था । जब वे बिलासपुर-रायपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर तिवारी
पेट्रोल पंप एवं आरती ढाबा के समीप पहुंचे, तभी दो मोटरसाइकिलों में सवार 06 व्यक्ति
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
वहाँ आए और उन्हें रोक लिया । उन व्यक्तियों के हाथों में चाकू तथा पिस्तौल थे । प्रार्थी
रामस्वरूप देवांगन के अनुसार उक्त व्यक्तियों ने सीताराम साहू (अ.सा.-2) तथा संतोष
तिवारी (अ.सा.-5) पर चाकू से हमला किया । इस दौरान प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन के
पास से ₹500/- एवं मोबाइल फोन छीनने का प्रयास किया गया, किं तु उसने अपना
मोबाइल फोन दूर फें क दिया । इसके अतिरिक्त संतोष तिवारी से पर्स , नगद राशि तथा
मोबाइल फोन लूट लिए गए तथा उनकी मोटरसाइकिल भी छीन ली गई । घटना के दौरान
संतोष तिवारी के पेट में तथा सीताराम साहू की जांघ में चाकू से वार किया । तत्पश्चात्
प्रार्थी द्वारा थाना सरगांव में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर प्रथम सूचना पत्र
प्रदर्श पी-1 दर्ज की गई ।
10. प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) के उक्त कथनों की पुष्टि करते हुए सीताराम साहू
(अ.सा.-2) ने बताया है कि वे चारों व्यक्ति एक ही मोटरसाइकिल से ग्राम टेमरी जा रहे
थे, तभी अज्ञात व्यक्तियों ने उनकी मोटरसाइकिल लूट ली तथा उन पर चाकू से हमला
किया, जिससे उसे तथा संतोष तिवारी को चोटें आईं । तेज बहादुर (अ.सा.-3) ने भी
घटना की पुष्टि करते हुए बताया है कि दो मोटरसाइकिलों में आए लगभग 06 व्यक्तियों ने
चाकू दिखाकर उनके साथ मारपीट की तथा लूटपाट की । इसी प्रकार संतोष तिवारी
(अ.सा.-5) ने भी अपने कथन में घटनाक्रम का समर्थन करते हुए कहा है कि दो
मोटरसाइकिलों में सवार 06 व्यक्तियों ने चाकू एवं पिस्तौल दिखाकर उससे मोबाइल फोन
तथा लगभग ₹800-900/- की नगद राशि लूट ली तथा उनमें से एक व्यक्ति ने उसके
पेट में चाकू से वार किया, जिससे उसे चोट आई ।
11. चिकित्सक मोहनिस कु र्रे (अ.सा.-7) ने संतोष तिवारी (अ.सा.-5) का चिकित्सीय
परीक्षण किया तथा अपने प्रतिवेदन में उसके पेट के समीप धारदार हथियार से लगी 2 x
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
0.5 से.मी. आकार की तथा लगभग 2 से.मी. गहराई की चोट का उल्लेख किया है । इसी
प्रकार उन्होंने सीताराम साहू (अ.सा.-2) के चिकित्सीय परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श पी-22
को भी प्रमाणित करते हुए उसके बाएँ जांघ में धारदार हथियार की चोट होना बताया है ।
इस प्रकार प्रस्तुत चिकित्सीय एवं मौखिक अभियोजन साक्ष्य से यह तथ्य प्रमाणित होता है
कि पाँच से अधिक व्यक्तियों ने विधि विरुद्ध जमाव का सदस्य रहते हुए प्रार्थी पक्ष का न
के वल सदोष अवरोध किया, बल्कि घातक हथियारों से सुसज्जित होकर उन पर हमला
कर हत्या का प्रयास किया तथा उनसे लूट की घटना कारित की ।
12. प्रमुख रूप से यह देखा जाना है कि क्या उक्त घटना अपीलार्थीगण ने कारित की थी?
13. अपीलार्थीगण की दोषसिद्धि का प्रथम आधार यह बताया गया है कि शिनाख़्त कार्यवाही
प्रदर्श पी-4 तथा प्रदर्श पी-33 में प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) द्वारा
अपीलार्थीगण की पहचान घटना कारित करने वाले व्यक्तियों के रूप में की गई है । प्रार्थी
रामस्वरूप देवांगन द्वारा पुलिस थाना में जो प्रथम सूचना पत्र दर्ज कराई गई है, उसमें
किसी भी अपीलार्थी अथवा अभियुक्त के नाम, हुलिया अथवा पहचान संबंधी विवरण
अंकित नहीं है । परिणामस्वरूप अभियोजन को अभियुक्तगण की पहचान स्थापित करने के
उद्देश्य से शिनाख़्त कार्यवाही कराना आवश्यक प्रतीत हुआ । उक्त शिनाख़्त कार्यवाही
के वल प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) से ही कराई गई है । जबकि घटना के समय
सीताराम साहू (अ.सा.-2), तेज बहादुर (अ.सा.-3) तथा संतोष तिवारी (अ.सा.-5)
भी घटनास्थल पर उपस्थित थे, तथापि अभियोजन द्वारा उनसे किसी भी अभियुक्त की
पहचान कराने का प्रयास नहीं किया गया । अतः उपर्युक्त परिस्थितियों में प्रार्थी रामस्वरूप
देवांगन (अ.सा.-1) द्वारा की गई शिनाख़्त कार्यवाही की वैधता एवं विश्वसनीयता का
परीक्षण विशेष सावधानी के साथ किया जाना आवश्यक हो जाता है ।
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
14. In the matter of Dal Chand v. State, AIR 1953 All 123, their Lordships
of Allahabad High Court held that as a safe rule of prudence, a fair
proportion of outsiders mixed with the suspects, considering the
circumstances of the case should always be insisted upon by every
Magistrate who is charged with the duty of conducting identification
proceedings.
15. Similarly, in State v. Wahid Bux, AIR 1953 All 314 in identification
parades, it is always better to have as large a number of persons mixed
up with the accused as possible. If five times the number of the accused
persons are mixed with them, it cannot be said that there is any flaw in
the identification proceedings.
16. प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) से दिनांक 06/05/2023 को प्रदर्श पी-33 के
अनुसार कु ल 04 अभियुक्तों की शिनाख़्त कार्यवाही नायब तहसीलदार देशकु मार कु र्रे
(अ.सा.-13) द्वारा कराई गई है । उक्त शिनाख़्त कार्यवाही में अन्य व्यक्तियों के रूप में
मात्र तीन व्यक्तियों को ही सम्मिलित किया गया था । इस प्रकार जिन अभियुक्तों की
पहचान कराई जानी थी, उनके साथ मिलाए गए व्यक्तियों की संख्या उनसे भी कम थी, जो
विधिसम्मत शिनाख़्त कार्यवाही की प्रक्रिया के अनुरूप प्रतीत नहीं होती । इसके पश्चात्
दूसरी बार दिनांक 20/05/2023 को इसी प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) से
प्रदर्श पी-4 के अनुसार कार्यपालिक मजिस्ट्रेट सुशील कु मार कु लमित्र (अ.सा.-9) द्वारा
शिनाख़्त कार्यवाही अभियुक्त सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव तथा असलम उर्फ अंकु श मडामे की
कराई गई । उक्त शिनाख़्त कार्यवाही में अन्य व्यक्तियों के रूप में 04 व्यक्तियों को
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
सम्मिलित किया गया था । इस प्रकार न्यायदृष्टांत के अनुसार शिनाख़्त कार्यवाही में
अपीलार्थीगण के साथ मिलाए गए व्यक्तियों की संख्या पर्याप्त नहीं थी ।
17. Recently, in the matter of Gireesan Nair v. State of Kerala, (2023) 1 SCC
180, Their Lordships of the Supreme Court held as under:-
“32. If identification in the TIP has taken place after
the accused is shown to the witnesses, then not
only is the evidence of TIP inadmissible, even an
identification in a court during trial is
meaningless {Sk. Umar Ahmed Shaikh v. State of
Maharashtra, (1998) 5 SCC 103}. Even a TIP
conducted in the presence of a police officer is
inadmissible in light of Section 162 of the
Criminal Procedure Code, 1973 {Chunthuram v.
State of Chhattisgarh (2020) 10 SCC 733} and
{Ramkishan Mithanlal Sharma v. State of
Bombay, (1954) 2 SCC 516}.
33. It is significant to maintain a healthy ratio
between suspects and non-suspects during a TIP.
If rules to that effect are provided in Prison
Manuals or if an appropriate authority has issued
guidelines regarding the ratio to be maintained,
then such rules/guidelines shall be followed. The
officer conducting the TIP is under a compelling
obligation to mandatorily maintain the
prescribed ratio. While conducting a TIP, it is a
sine qua non that the non-suspects should be of
the same age-group and should also have similar
physical features (size, weight, color, beard,
scars, marks, bodily injuries etc.) to that of the
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)suspects. The officer concerned overseeing the
TIP should also record such physical features
before commencing the TIP proceeding. This
gives credibility to the TIP and ensures that the
TIP is not just an empty formality {Rajesh Govind
Jagesha v. State of Maharashtra and Ravi v. State,
(2007) 15 SCC 372}.”
18. In the matter of Bollavaram Pedda Narsi Reddy v. State of Andhra
Pradesh, (1991) 3 SCC 434, their Lordships of the Supreme Court
clearly held that the evidence given by the witnesses before the Court is
the substantive evidence. In a case where the witness is a stranger to
the accused and he identifies the accused person before the court for
the first time, the court will not ordinarily accept that identification as
conclusive. It is to lend assurance to the testimony of the witnesses that
evidence in the form of an earlier identification is tendered and held
observed in Para- 08 as under:
“8. The witness is a stranger to the accused and he
identifies the accused person before the court for
the first time, the court will not ordinarily accept
that identification as conclusive. It is to lend
assurance to the testimony of the witnesses that
evidence in the form of an earlier Identification is
tendered. If the accused persons are got
identified by the witness soon after their arrest
and such Identification does not suffer from any
infirmity that circumstance leads corroboration
to the evidence given by the witness before the
court. But in a case where the evidence before
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)the court is itself shaky, the Identification before
the magistrate would be of no assistance to the
prosecution.”
19. उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के आलोक में निष्पक्ष एवं पक्षपात रहित विवेचना के लिए प्रत्येक
अभियुक्त की शिनाख़्त पृथक-पृथक रूप से कराई जानी चाहिए । प्रस्तुत प्रकरण में ऐसा
किया जाना अभिलेख से परिलक्षित नहीं होता । स्थापित विधिक सिद्धांतों के अनुसार
शिनाख़्त कार्यवाही में अभियुक्त के साथ सम्मिलित किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या
अभियुक्तों की संख्या से कम से कम चार से पाँच गुना अधिक होनी चाहिए, जिससे पहचान
की प्रक्रिया निष्पक्ष एवं विश्वसनीय हो । किं तु विचाराधीन मामले में कराई गई शिनाख़्त
कार्यवाही में यह आवश्यकता भी नहीं अपनाई गयी । यह भी उल्लेखनीय है कि कु ल छह
अभियुक्तों की शिनाख़्त कार्यवाही दो अलग-अलग तिथियों पर कराई गई है, किं तु प्रार्थी
रामस्वरूप देवांगन, जो कि पहचान करने वाला मुख्य साक्षी है, उसने कथन में के वल एक
ही बार प्रदर्श पी-4 के अंतर्गत शिनाख़्त कार्यवाही होने की बात कही है । प्रदर्श पी-33
के अंतर्गत संपन्न शिनाख़्त कार्यवाही के संबंध में उसने कोई स्पष्ट कथन नहीं किया है ।
इसके अतिरिक्त प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन ने अपने प्रतिपरीक्षण की कण्डिका-13 में यह भी
स्वीकार किया है कि पहचान कार्यवाही से पूर्व पुलिस द्वारा उसे बुलाकर अभियुक्तगण को
दिखाया गया था तथा कहा गया था कि यही व्यक्ति अपराध में सम्मिलित थे, जिनकी
पहचान की जानी है । प्रार्थी के अनुसार उसने उसी आधार पर अभियुक्तगण की पहचान
की थी । ऐसी स्थिति में, जब प्रथम सूचना पत्र में किसी भी अभियुक्त का नाम अथवा
हुलिया उल्लेखित नहीं किया गया है, तब न्यायालय के समक्ष प्रार्थी का यह कहना कि वह
अभियुक्तगण को पहचानता था और वे ही अपराध में सम्मिलित थे, स्वाभाविक एवं
विश्वसनीय नहीं पाया जाता । इस प्रकार इस मामले में कराई गई शिनाख़्त कार्यवाही
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
स्पष्ट, निष्पक्ष एवं संदेह से परे प्रमाणित नहीं होती, अपितु उसमें गंभीर संदेह उत्पन्न होता
है । जिन अन्य साक्षियों से शिनाख़्त नहीं कराई गई है, उनके द्वारा न्यायालयीन कथन में
यह कहना कि वे अभियुक्तगण को पहचानते हैं, वह भी विश्वसनीय नहीं माना जा सकता ।
फलस्वरूप, यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थीगण की दोषसिद्धि का जो एक प्रमुख
आधार शिनाख़्त कार्यवाही को बताया गया है, वह विधिवत एवं विश्वसनीय नहीं पाई
जाती । उक्त शिनाख़्त कार्यवाही संदेहास्पद होने के कारण अपीलार्थीगण की दोषसिद्धि का
आधार नहीं बन सकती ।
20. अपीलार्थीगण की दोषसिद्धि का दूसरा प्रमुख आधार यह बताया गया है कि अपीलार्थीगण
से लूट की वस्तुओं तथा घटना में प्रयुक्त चाकू की जब्ती की गई है । अभिलेख से यह
परिलक्षित होता है कि उक्त समस्त प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती की कार्यवाही निरीक्षक
विवेचक प्रमोद डनसेना (अ.सा.-14) द्वारा की गई है । उनके कथन के अनुसार अभियुक्त
प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू के मेमोरण्डम कथन प्रदर्श पी-5 के आधार पर उससे
एक हीरो होंडा सीडी-100 ड्रीम मोटरसाइकिल, जिसका इंजन क्रमांक JC67EA10542
85 तथा चेसिस क्रमांक ME4JC67DFKA024283 है, तथा एक स्टील का बटनदार
चाकू जब्त कर प्रदर्श पी-12 तैयार किया गया । इसी प्रकार अभियुक्त संदीप उर्फ प्रशांत
वैष्णव के मेमोरण्डम कथन प्रदर्श पी-7 के आधार पर उससे एक हीरो एचएफ डिलक्स
मोटरसाइकिल, जिसका इंजन क्रमांक HA11ENHHG00280 तथा चेसिस क्रमांक
MBLHAR233HHG07067 है, जब्त कर प्रदर्श पी-13 तैयार किया गया । अभियुक्त
विवेक ध्रुव के मेमोरण्डम कथन प्रदर्श पी-8 के आधार पर उससे प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन
का आधार कार्ड तथा नकद ₹300/- जब्त कर प्रदर्श पी-11 तैयार किया गया ।
अभियुक्त सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव के मेमोरण्डम कथन प्रदर्श पी-9 के आधार पर एक हीरो
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
स्प्लेंडर प्रो मोटरसाइकिल क्रमांक सी.जी.-04-के .डब्ल्यू.-9766 जब्त कर प्रदर्श
पी-14 तैयार किया गया तथा अभियुक्त असलम उर्फ अंकु श मडामे के मेमोरण्डम कथन
प्रदर्श पी-10 के आधार पर उससे एक स्टील का बटनदार चाकू जब्त कर प्रदर्श पी-15
तैयार किया गया ।
21. उपरोक्त प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती कार्यवाही का साक्षी भुवनेश्वर कौशिक (अ.सा.-8)
पक्षद्रोही हो गया है । उसने उक्त कार्यवाही की पुष्टि नहीं की है, बल्कि के वल अपना
हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है । इस प्रकार इस स्वतंत्र साक्षी द्वारा विवेचक के कथनों
की पुष्टि नहीं की गई है, जिससे उक्त प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती कार्यवाही की
विश्वसनीयता संदिग्ध होती है ।
22. अभियुक्तगण के प्रकटीकरण कथन एवं जब्ती कार्यवाही का दूसरा महत्वपूर्ण साक्षी राजा
कौशिक (अ.सा.-6) है । उसने अपने न्यायालयीन कथन में अपीलार्थीगण के
प्रकटीकरण कथन तथा जब्ती पर अपना हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है । अभियोजन
द्वारा उसे पक्षद्रोही घोषित किए जाने पर सूचक प्रश्नों के माध्यम से उसने उक्त प्रकटीकरण
कथन एवं जब्ती कार्यवाही की पुष्टि किया है । तथापि प्रतिपरीक्षण के दौरान इस साक्षी ने
यह भी कहा है कि उसने सभी हस्ताक्षर थाने में एक ही समय पर किए थे तथा वह लगभग
दो घंटे तक थाने में उपस्थित रहा, जिसके दौरान समस्त कार्यवाही संपन्न हुई थी । इस
प्रकार उसके कथन से यह स्पष्ट होता है कि वह सूचक प्रश्न के पश्चात् प्रतिपरीक्षण में
अपने कथन पर स्थिर नहीं रहा है । इसके अतिरिक्त, पृथक रूप से पूछे जाने पर वह यह
बताने में भी असमर्थ रहा कि किस अभियुक्त से कौन-सी वस्तु की जब्ती की गई थी ।
इस प्रकार दूसरे स्वतंत्र साक्षी के कथन से भी विवेचक के कथन का स्पष्ट समर्थन नहीं
होता है, जिससे प्रकटीकरण एवं जब्ती कार्यवाही संदिग्ध होती है ।
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
23. स्वयं विवेचक निरीक्षक प्रमोद डनसेना (अ.सा.-14) के कथन की विश्वसनीयता का
आं कलन करने पर यह उल्लेखनीय है कि विवेचक का कथन अपने आप में स्पष्ट, सुसंगत
एवं विधि के अनुरूप होना चाहिए । विशेष रूप से धारा-27 भारतीय साक्ष्य अधिनियम
के प्रावधान के अनुसार यह आवश्यक है कि विवेचक अपने कथन में स्पष्ट रूप से यह
दर्शाए कि किस अभियुक्त ने क्या कथन किया, उस कथन के आधार पर कौन-सा नया
तथ्य प्रकाश में आया तथा अभियुक्त की निशानदेही पर किस स्थान से कौन-सी वस्तु
जब्त की गई । विवेचक द्वारा दस्तावेजों को मात्र चिन्हांकित किया जाना विधिक रूप से
प्रमाणित करने की अपेक्षा को पूरा नहीं करता । इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय
द्वारा न्यायदृष्टांत Raja Khan v. State of Chhattisgarh, (2025) 3 SCC 314 की
कण्डिका-38 में निम्नानुसार प्रतिपादित किया गया हैः-
“38. This Court in Varun Chaudhary v. State of
Rajasthan, (2011) 12 SCC 545 and Mustkeem a
v. State of Rajasthan, (2011) 11 SCC 724, has
held that if the recovery memos have been
prepared in the police station itself or signed by
the panch witnesses in the police station, the
same would lose their sanctity and cannot be
relied upon by the Court to support the
conviction.”
24. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायदृष्टांत Babu Sahebagouda Rudaragoudar
(Supra) की कण्डिका-66 एवं 67 निम्नानुसार हैः-
“66. Further, in Subramanya v. State of Karnataka,
(2023) 11 SCC 255, it was held as under: (SCC
pp. 299-300, paras 76 to 78)
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)“76. Keeping in mind the aforesaid evidence,
we proceed to consider whether the prosecution
has been able to prove and establish the
discoveries in accordance with law. Section 27 of
the Evidence Act reads thus:
27. How much of information received from
accused may be proved.-Provided that, when any
fact is deposed to as discovered in consequence
of information received from a person accused of
any offence. in the custody of a police officer, so
much of such information, whether it amounts to
a confession or not, as relates distinctly to the
fact thereby discovered, may be proved.’
77. The first and the basic infirmity in the
evidence of all the aforesaid prosecution
witnesses is that none of them have deposed the
exact statement said to have been made by the
appellant herein which ultimately led to the
discovery of a fact relevant under Section 27 of
the Evidence Act.
78. If, it is say of the investigating officer that
the appellant-accused while in custody on his
own free will and volition made a statement that
he would lead to the place where he had hidden
the weapon of offence, the site of burial of the
dead body, clothes, etc, then the first thing that
the investigating officer should have done was to
call for two independent witnesses at the police
station itself. Once the two independent
witnesses would arrive at the police station
thereafter in their presence the accused should
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)be asked to make an appropriate statement as he
may desire in regard to pointing out the place
where he is said to have hidden the weapon of
offence, etc. When the accused while in custody
makes such statement before the two
independent witnesses (panch witnesses) the
exact statement or rather the exact words uttered
by the accused should be incorporated in the first
part of the panchnama that the investigating
officer may draw in accordance with law. This
first part of the panchnama for the purpose of
Section 27 of the Evidence Act is always drawn at
the police station in the presence of the
independent witnesses so as to lend credence
that a particular statement was made by the
accused expressing his willingness on his own
free will and volition to point out the place
where the weapon of offence or any other article
used in the commission of the offence had been
hidden. Once the first part of the panchnama is
completed thereafter b the police party along
with the accused and the two independent
witnesses (panch witnesses) would proceed to
the particular place as may be led by the accused.
If from that particular place anything like the
weapon of offence or bloodstained clothes or any
other article is discovered then that part of the
entire process would form the second part of the
panchnama. This is how the law expects the
investigating officer to draw the discovery
panchnama as contemplated under Section 27 of
the Evidence Act. If we read the entire oral
evidence of the investigating officer then it is
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
clear that the same is deficient in all the
aforesaid relevant aspects of the matter.”
67. Similar view was taken by this Court in
Ramanand v. State of U.P., (2023) 16 SCC 510,
wherein this Court held that mere exhibiting of
memorandum prepared by the investigating
officer during investigation cannot tantamount to
proof of its contents. While testifying on oath, the
investigating officer would be required to narrate
the sequence of events which transpired leading
to the recording of the disclosure statement.”
25. उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के आलोक में प्रस्तुत प्रकरण में संकलित साक्ष्य पर विचार करने से
यह स्पष्ट होता है कि विवेचक प्रमोद डनसेना (अ.सा.-14) ने अपने न्यायालयीन कथन में
यह स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया है कि किस अभियुक्त ने क्या कथन किया था तथा उन
कथनों के आधार पर किस स्थान पर जाकर कौन-सी वस्तु की जब्ती की गई । के वल
दस्तावेजों को प्रदर्श अंकित कर देना तथा उनमें विवेचक के हस्ताक्षर को चिन्हांकित कर
देना, धारा 27 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत अभियुक्त के प्रकटीकरण कथन तथा
उसके आधार पर की गई जब्ती को विधिवत प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा
सकता । विवेचक ने विधि के अनुरूप अपीलार्थीगण के प्रकटीकरण कथन एवं कथित
जब्ती को स्पष्ट एवं विधिवत प्रमाणित नहीं किया है तथा उक्त कथन और जब्ती कार्यवाही
किसी स्वतंत्र साक्षी द्वारा स्पष्ट रूप से पुष्ट भी नहीं है, इसलिए यह कार्यवाही विधिवत
प्रमाणित नहीं पाई जाती । फलस्वरूप, अपीलार्थी प्रियांशु साहू उर्फ स्वयं राजा साहू तथा
असलम उर्फ अंकु श मडामे से कथित रूप से चाकू की जब्ती भी प्रमाणित नहीं होती ।
अतः उनके विरुद्ध आयुध अधिनियम के अंतर्गत आरोप भी प्रमाणित नहीं पाया जाता ।
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26. प्रार्थी पक्ष कथित घटना के समय जिस मोटरसाइकिल से जा रहे थे तथा जो मोटरसाइकिल
लूट लिए जाने का कथन किया गया है, उसके संबंध में कोई दस्तावेज अभिलेख पर
प्रस्तुत नहीं किया गया है । प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श पी-1 में लूटी गई मोटरसाइकिल को
सी.डी. डिलक्स, पंजीयन क्रमांक सी.जी.-04-एल.एक्स.-9306 बताया गया है, किं तु
उक्त मोटरसाइकिल का कोई पंजीयन प्रमाणपत्र न्यायालय के समक्ष प्रमाणित नहीं कराया
गया है । अपीलार्थीगण के प्रकटीकरण कथन के आधार पर जिन तीन मोटरसाइकिलों की
जब्ती दर्शाई गई है, उनमें से किसी का भी पंजीयन क्रमांक उपरोक्त कथित लूटी गई
मोटरसाइकिल के पंजीयन क्रमांक के समरूप स्थापित नहीं किया जा सका है । जब्त की
गई तीन मोटरसाइकिलों में से के वल एक मोटरसाइकिल का पंजीयन क्रमांक सी.जी.-
04-के .डब्ल्यू.-9766 बताया गया है, जो कि जब्ती प्रदर्श पी-14 के अनुसार अभियुक्त
सौरभ उर्फ सोमू ध्रुव से जब्त की गई है, किं तु यह मोटरसाइकिल लूट की कथित विषय-
वस्तु नहीं है । अन्य दो मोटरसाइकिलों के संबंध में जब्ती पत्र में के वल उनके इंजन
क्रमांक तथा चेसिस क्रमांक का उल्लेख किया गया है । जबकि लूटी गयी मोटरसाइकिल का
इंजन व चेसिस क्रमांक क्या था, यह अभिलेख में नहीं है । जब्त मोटरसाइकिलों की
पहचान भी नहीं करायी गयी है जिससे कि लूट की मोटरसाईकिल की शिनाख़्त की जा
सके । इस प्रकार यह स्थापित नहीं किया जा सका है कि जब्ती में कौन सी
मोटरसाईकिल थी, जो घटना में लूटी गई थीं ।
27. इसी प्रकार, जो मोबाईल फोन लूट की विषय-वस्तु बतायी गयी है, वैसा कोई मोबाईल
फोन भी किसी अपीलार्थी से जब्त नहीं हुआ है । अपीलार्थी विवेक ध्रुव से नकद
₹300/- की जब्ती का प्रश्न है, यह सर्वविदित तथ्य है कि इतनी राशि सामान्यतः किसी
भी व्यक्ति के पास उपलब्ध हो सकती है । जब्त की गई राशि भी इतनी अधिक नहीं है कि
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि वह अवश्य ही लूट की ही राशि थी ।
इसके अतिरिक्त, किसी प्रकार की विशिष्ट पहचान अथवा नोटों का क्रमांक भी अभिलेख पर
प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे यह कहा जा सके कि विवेक ध्रुव से जब्त किए गए नोट
वही थे, जो लूटी गयी थी । अतः मात्र ₹300/- की नकद जब्ती के आधार पर
अपीलार्थी विवेक ध्रुव की लूट के अपराध में संलिप्तता को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया
जा सकता ।
28. विवेचक प्रमोद डनसेना (अ.सा.-14) के कथनानुसार अपीलार्थी विवेक ध्रुव से जब्ती
प्रदर्श पी-11 के अंतर्गत प्रार्थी रामस्वरूप देवांगन (अ.सा.-1) का आधार कार्ड भी जब्त
किया जाना बताया गया है । किं तु स्वयं रामस्वरूप देवांगन ने न तो प्रथम सूचना पत्र में
और न ही धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत अपने कथन में कहीं यह
उल्लेख किया है कि उसका आधार कार्ड लूट लिया गया था अथवा खो गया था । ऐसी
स्थिति में अपीलार्थी विवेक ध्रुव से आधार कार्ड की कथित जब्ती संदेहास्पद होती है ।
29. उपरोक्त साक्ष्य विवेचना के आधार पर यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थीगण के
अभियोजन तथा उनकी दोषसिद्धि का प्रमुख आधार शिनाख़्त कार्यवाही एवं प्रकटीकरण
कथन के आधार पर लूट की वस्तुओं की जब्ती रही है । तथापि अभिलेख पर उपलब्ध
साक्ष्य से उक्त शिनाख़्त कार्यवाही, प्रकटीकरण कथन तथा उसके आधार पर की गई
जब्ती, संदेह से परे विधि सम्मत रूप से प्रमाणित नहीं है तथा समस्त कार्यवाही संदेहास्पद
है । इस प्रकार कथित घटना में अपीलार्थीगण की संलिप्तता प्रमाणित नहीं है । ऐसे
संदेहास्पद साक्ष्य के आधार पर की गई अपीलार्थीगण की “प्रश्नाधीन दोषसिद्धि एवं
दण्डादेश” का निर्णय स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है ।
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(Cr. A. No.-411 of 2024, 467 of 2024, 529 of 2024, 930 of 2024, 1795 of 2024 & 1809 of 2024)
30. अतः अपील स्वीकार की जाती है । “प्रश्नाधीन दोषसिद्धि व दण्डादेश” अपास्त किया
जाता है तथा अपीलार्थीगण को आरोपित अपराध से दोषमुक्त किया जाता है ।
31. अपीलार्थीगण को जेल में निरूद्घ बताया गया है । यदि उनकी अन्य मामले में आवश्यकता
न हो तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए ।
32. निर्णय की प्रति के साथ विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख तथा निर्णय की
सत्यप्रतिलिपि संबंधित जेल अधीक्षक को आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ एवं पालनार्थ
शीघ्रतापूर्वक प्रेषित हो ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल)
न्यायाधीश
पोमन
