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स्वप्रेरणा संज्ञान क्या होता है ? what is sou moto cognizance ?

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नमस्कार मित्रों,

आज के इस लेख में हम जानेंगे कि ” स्वप्रेरणा संज्ञान क्या होता है “,” what is sou moto cognizance ?” अक्सर sou moto cognizance यानी स्वप्रेरणा संज्ञान इस शब्द को सुनते है खास कर जब चर्चा देश न्यायालय की होती है , की न्यायालय द्वारा किसी मामले का स्वप्रेरणा संज्ञान लिया गया।  ऐसा मामला जिसके सम्बन्ध में न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर उचित कार्यवाही करती है। 

स्वप्रेरणा संज्ञान क्या होता है ? what is sou moto cognizance ?

इसको लेकर कई सवाल उठ रहे होंगे जैसे कि :-

  1. स्वप्रेरणा संज्ञान (sou moto congizance) क्या है ?
  2. न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा संज्ञान किन किन मामलों में लिया गया है ?
  3. न्यायालय अपनी स्वप्रेरणा संज्ञान की शक्ति का प्रयोग कैसे करती है ?

इन सभी को विस्तार से जानते है ?

 1. स्वप्रेरणा संज्ञान ( sou moto cognizance ) क्या है ?

साधारण भाषा में स्वप्रेरणा संज्ञान ( sou moto cognizance ) का अर्थ भारत के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की वह शक्ति जिसका उपयोग कर न्ययालय किसी पक्ष,समुदाय या समूह द्वारा औपचरिक आवेदन या  याचिका दायर किये बिना देश के किसी भी मामले का स्वयं संज्ञान लेकर जो भी उचित कार्यवाही हो कर सकेगा।  इसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक हित, सामाजिक अन्याय या  मौलिक अधिकारों की रक्षा कर न्याय प्रदान करना। 

न्यायालय किसी मामले का स्वयं सज्ञान ले सकता है , जब उसके ज्ञान में ऐसा कोई मामला मीडिया रिपोर्ट, प्राप्त पत्रों , या अन्य श्रोतों के जरिये किसी मामले की सूचना प्राप्त होती है, जो की नागरिकों के न्याय हित में है । 

स्वप्रेरणा संज्ञान की यह शक्ति भारतीय न्यायपालिका को न्याय सुनिश्चित करने की शक्ति प्रदान करती है , इसके जरिये नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए सक्रीय रूप से सक्षम बनाती है। 

कानूनी भाषा में sou moto cognizance जो कि एक लैटिन शब्द है , इसका अर्थ है अपनी गति। न्यायालय, सरकारी एजेंसी या केंद्रीय प्राधिकरण किसी पक्ष के अनुरोध , औपचारिक याचिका , आवेदन के बिना स्वयं द्वारा अपनी समझ या पहल पर की गयी कार्यवाही। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को स्वप्रेरणा संज्ञान की शक्ति का प्रयोग कर कार्यवाही करने का अधिकार प्रदान करता है, जिसके तहत न्यायालय किसी कार्य को करने या न करने के दिशा निर्देश जारी कर सकेगा। 

भारतीय अनुच्छेद 131 के तहत उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता का उल्लेख किया गया , जिसके तहत किसी मामले का स्वप्रेरणा संज्ञान कर उचित कानूनी कार्यवाही कर सकती है। 

जब न्यायपालिका को यह उचित समाधान हो जाता है कि देश में ऐसा कोई गंभीर मामला उत्पन्न है , जो कि देश की राष्ट्रीयता , एकता , अखण्डता या नागरिकों के मौलिक अधिकारों या सार्वजनिक हित, सार्वजनिक न्याय के लिए जरुरी है ,तो तत्काल स्वयं संज्ञान लेकर हस्तक्षेप कर मामले में उचित कानूनी कार्यवाही करता है। 

न्यायालय अवमाना अधिनियम 1971 के उपबंधों के अंतर्गत न्यायालय की अवमानना होने पर भी न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर कानूनी कार्यवाही कर सकती है। 

2. न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा संज्ञान किन किन मामलों में लिया गया है ?

न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा संज्ञान निम्न मामलों में लिया गया है जब कोई मामला स्वतः उनके सामने हुआ या जब मामलों का ज्ञान पत्र , समाचार , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  या अन्य श्रोतों के माध्यम से हुआ है। जैसे कि :-

  1. न्यायालय की अवमानना। 
  2. मौलिक अधिकारों का संरक्षण। 
  3. नवीन मामलों की जाँच के आदेश। 
  4. प्राचीन मामलों / बंद मामलों को पुनः खोलना। 
  5. सार्वजनिक हित के मामलें। 

1. न्यायालय की अवमाना। 

न्यायलय की अवमानना से तात्यपर्य है न्यायालय के प्रति जो एक सम्मान, अवज्ञा , नियमों , विनियमों, आचार संहिता, न्यायालय की गरिमा को बनाये रखना शामिल है , ऐसे में किसी व्यक्ति के द्वारा पालन न किया जाना, असंवैधानिक कृत्य और भाषा का उपयोग करना शामिल है।  

2. मौलिक अधिकारों का संरक्षण। 

न्यायालय को यह उचित कारण प्राप्त होता है कि किन्ही परिस्थितियों में देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है , संविधान द्वारा प्रदान किये गए मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है , तो ऐसे अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायालय स्वप्रेरणा लेकर न्यायिक कार्यवाही करती है। 

3. नवीन मामलों की जाँच के आदेश। 

किसी मामले के सम्बन्ध में न्यायालय को पर्याप्त कारण दर्शित हो और उचित समाधान हो जाता है, कि किसी व्यक्त, समूह या समुदाय के प्रति किसी प्रकार का अन्याय हुआ है तो , न्यायालय ऐसे मामलों का स्वतः संज्ञान लेकर मामले की जाँच का आदेश दे सकेगी।  ये जाँच किसी भी :-

  1. सरकारी प्राधिकरण,
  2. पुलिस विभाग,
  3. सीबीआई या अन्य एजेंसी को मामले की जाँच करने का आदेश पारित कर सकती है।  

4. प्राचीन / बंद मामलों को पुनः खोलना। 

न्यायालय द्वारा जब किसी मामले की कार्यवाही कर उसे बंद कर दिया जाता है , और समय के अनुसार किसी बंद मामले के सम्बन्ध किन्ही श्रोतो के माध्यम से उचित व् पर्याप्त साक्ष्य की प्राप्ति होती है , न्यायालय स्वप्रेरणा से ऐसे बंद मामलों को पुनः खोलने के न्यायिक कार्यवाही कर सकती है। 

5. सार्वजनिक हित के मामलें। 

न्यायालय को जब उचित कारण प्राप्त होते ह , कि कोई ऐसा मामला है , जो कि सार्वजानिक हित के लिए है यानी किसी विशेष व्यक्ति , समूह या समुदाय के व्यक्तिगत हित के लिए न होकर सम्पूर्ण जगत के लिए है , तो स्वप्रेरणा संज्ञान लेकर न्यायिक कार्यवाही कर सकती है। सार्वजनिक हित के मामले जैसे कि :-

  1. पर्यावरण सम्बन्धी मामले,
  2. वायु प्रदूषण सम्बन्धी मामले ,
  3. भ्रष्टाचार के मामले ,
  4. मानवाधिकार ,
  5. निति में सुधार व् बदलाव
  6. आपदा के समय जैसे कोविद 19 . 
  7. अन्य सार्वजनिक हितों के लिए। 

3. न्यायालय अपनी स्वप्रेरणा की शक्ति का प्रयोग कैसे करती है – प्रक्रिया क्या है ?

न्यायालय जब भी किसी मामले पर स्वतः संज्ञान लेती है , तो उसकी एक न्यायिक प्रक्रिया होती है , जो कि नैसर्गिंक न्याय के सिद्धांतों का पालन करती है। स्वप्रेरणा संज्ञान के लिए न्यायालय निम्न प्रक्रिया को उपयोग में लाती है :-

  1. संज्ञान लेना। 
  2. नोटिस जारी करना। 
  3. जवाब मांगना। 
  4. समितियों का गठन / नियुक्ति करना। 
  5. आदेश पारित करना। 







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