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विवाह के बाद महिलाओं के अधिकार क्या है ?

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नमस्कार मित्रों,

आज के इस लेख में हम जानेंगे कि ” विवाह के बाद महिलाओं के अधिकार क्या है ?  भारत में प्रत्येक व्यक्ति को  भारतीय  संविधान के तहत मौलिक अधिकार प्रदान किये है, जी कि प्रत्येक नागरिक का जन्म सिद्ध अधिकार है। ऐसे ही कुछ अधिकार है जो कि प्रत्येक  महिलाओं को विवाह के बाद प्राप्त होते है। 

ये अधिकार महिलाओं के संरक्षण के लिए प्रदान किये जाते है, ताकि प्रत्येक विवाहित महिला सम्मान और गरिमा के साथ अपने जीवन को व्यतीत कर सके। 

विवाह के बाद महिलाओं के अधिकार क्या है ?

विवाह के बाद महिलाओं के अधिकार 

प्रत्येक विवाहित महिला को सम्मान और गरिमा से जीवन व्यतीत करने का अधिकार , जिसके तहत इन्हे निम्न अधिकार प्राप्त है :- 

  1.  भरण पोषण का अधिकार। 
  2. स्त्रीधन का अधिकार। 
  3. निवास का अधिकार। 
  4. सम्मान और गरिमा से जीने का अधिकार।  
  5. पैतृक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी का अधिकार। 

1. भरण पोषण का अधिकार। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 144 भरण पोषण का प्रावधान करती है , जिसके तहत एक विवाहित स्त्री जो स्वयं का भरण पोषण करने में असमर्थ है वह अपने पति से अपने भरण पोषण की मांग कर सकती है। 

2.स्त्रीधन का अधिकार। 

स्त्रीधन जिसका सीधे सम्बन्ध विवाहित महिला से है। विवाहित महिला को उसके विवाह के दौरान उसके पति के रिश्तेदार और मायके से और उसके जीवनकाल तक उसके माता पिता से मिलने वाला उपहार ही स्त्री धन है। इस स्त्रीधन में केवल विवाहित महिला का ही अधिकार है, वह चाहे जैसा इसका उपयोग करें। 

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा हिन्दू नारी की संपत्ति उसकी आत्यन्तिकाः अपनी संपत्ति होगी, जिसके तहत हिन्दू नारी के कब्जे में की गयी कोई भी सम्पत्ति चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ से पहले या बाद में अर्जित की गयी हो , उसके द्वारा पूर्ण स्वामी केतौर पर धारित की जाएगी न की परिसीमित स्वामी के तौर पर। 

स्त्री धन में शामिल निम्न सम्पति हो सकती है :-

  1. चल और अचल सम्पति। 
  2. विरासत से प्राप्त संपत्ति। 
  3. वसीयत से प्राप्त संपत्ति। 
  4. विभाजन से प्राप्त संपत्ति। 
  5. दान से प्राप्त संपत्ति। 
  6. अपने कौशल या परिश्रम से प्राप्त संपत्ति। 
  7. क्रय से प्राप्त सम्पत्ति। 
  8. चिरभोग से प्राप्त संपत्ति। 
  9. विवाह से पजल प्राप्त संपत्ति। 
  10. नगदी,
  11. आभूषण,,
  12. अन्य मूलयवान वस्तु। 

3.निवास का अधिकार। 

घरेलु हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 की धारा 19 निवास आदेश का प्रावधान करती है , जिसके तहत प्रत्येक विवाहित महिला को अपने पति के वैवाहिक गृह में निवास करने का अधिकार है , चाहे वह संयुत्क परिवार का घर हो , पैतृक संपत्ति हो, किराये का घर ही या स्वयं का ख़रीदा हुआ घर है।  

4.सम्मान और गरिमा से जीने का अधिकार। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण का अधिकार प्रदान करती है , किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण यदयहीक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं। 

भारत के प्रत्येक नागरिक को गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, इस अधिकार के साथ प्रत्येक विवाहित महिला को अपने ससुराल में सम्मान और गरिमा मान प्रतिष्ठता से जीवन व्यतीत करना का पूर्ण अधिकार रखती है। 

  1. पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार। 
  2. जीवन का अधिकार। 
  3. सामाजिक दबाव से मुक्ति। 

5. पैतृक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी का अधिकार। 

हिन्दू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के तहत विवाह के बाद भी बेटी अपने पिता की संपत्ति पर हिस्सा पाने के लिए दावा कर सकती है। पिता की मृत्यु 9 सितम्बर 2005 से पहले हुई है या 9 सितम्बर 2005 के बाद हुई है , तो बेटी अपने पिता की संपत्ति पर हिस्सा पाने के लिए दावा कर सकती है।  

बेटी के विवाहित होने के बाद भी उतना ही बराबर का हिस्सा होगा जितना बेटे का है न कम न ज्यादा। 







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